(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.5. अध्यायः 005
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
कर्णपराक्रमवर्णनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

नारद उवाच। 12-5-0x(6711)(81021)
आदित्कृतबलं कर्णं दृष्ट्वा राजा स मागधः।
आह्वयद्द्वैरथेनाजौ जरासन्धो महीपतिः॥ 12-5-1(81022)
तयोः समभवद्युद्धं दिव्यास्त्रविदुषोर्द्वयोः।
युधि नानाप्रहरणैरन्योन्यमभिवर्षतोः॥ 12-5-2(81023)
क्षीणबाणौ विधनुषौ भग्नखङ्गौ महीं गतौ।
बाहुभिः समसज्जेतामुभावतिबलान्वितौ॥ 12-5-3(81024)
[बाहुकण्टकयुद्धेन तस्य कर्णोऽथ युध्यतः।]
विभेदं संधिं देहस्य जरया श्लेषितस्य हि॥ 12-5-4(81025)
स विकारं शरीरस्य दृष्ट्वा नृपतिरात्मनः।
प्रीतोऽस्मीत्यब्रवीत्कर्णं वैरमुत्सृज्य दूरतः॥ 12-5-5(81026)
प्रीत्या ददौ स कर्णाय मालिनीं नगरीमनु।
अङ्गेषु नरशार्दूल स राजाऽऽसीत्सपत्नजित्॥ 12-5-6(81027)
पालयामास वर्णांस्तु कर्णः परबलार्दनः।
दुर्योधनस्यानुमते तवापि विदितं तथा॥ 12-5-7(81028)
एवं शस्त्रप्रतापेन प्रथितः सोऽभवत्क्षितौ।
त्वद्धितार्थं सुरेन्द्रेण भिक्षितो वर्मकुण्डले॥ 12-5-8(81029)
स दिव्ये सहजे प्रादात्कुण्डले परमार्चिते।
सहजं कवचं चापि मोहितो देवमायया॥ 12-5-9(81030)
विमुक्तः कुण्डलाभ्यां च सहजेन च वर्मणा।
निहतो विजयेनाजौ वासुदेवस्य पश्यतः॥ 12-5-10(81031)
ब्राह्मणस्यापि शापेन रामस्य च महात्मनः।
कुन्त्याश्च वरदानेन मायया च शतक्रतोः॥ 12-5-11(81032)
भीष्मावमानात्सङ्ख्यायां रथानामर्धकीर्तनात्।
शल्यतेजोवधाच्चापि वासुदेवनयेन च। 12-5-12(81033)
रुद्रस्य देवराजस्य यमस्य वरुणस्य च।
कुबेरद्रोणयोश्चैव कृपस्य च महात्मनः॥ 12-5-13(81034)
अस्त्राणि दिव्यान्यादाय युधि गाण्डीवधन्वना।
हतो वैकर्तनः कर्णो दिवाकरसमद्युतिः॥ 12-5-14(81035)
एवं शप्तस्तव भ्राता बहुभिश्चापि वञ्चितः।
न शोच्यः पुरुषव्याघ्र युद्धे हि निधनं गतः॥ ॥ 12-5-15(81036)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि पञ्चमोऽध्यायः॥ 5॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-5-4 बाहुकण्टकयुद्धेन बाहुकण्टकं केतकपत्रं तद्वद्यत्र बलिना दुर्बलस्य शरीरं पाट्यते तद्वाहुकण्टकं नाम युद्धम्॥ 12-5-5 विकारं पाटनरूपम्॥ 12-5-7 पालयामास चम्पां चेति झ. पाठः॥


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